प्रशासनिक सतर्कता और संकट का आगाज़ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पिछले कुछ दिनों से पेयजल की शुद्धता को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही थीं, वे अब आधिकारिक पुष्टि के बाद एक बड़े संकट में बदल गई हैं। इंदौर में दूषित पानी के कारण हुई दुखद मौतों के बाद भोपाल नगर निगम (BMC) ने एहतियातन पूरे शहर में जल परीक्षण अभियान चलाया। इस सघन जांच अभियान के दौरान शहर के विभिन्न हिस्सों से पानी के नमूने लिए गए, जिनकी लैब रिपोर्ट ने प्रशासन के होश उड़ा दिए हैं। रिपोर्ट में पानी के भीतर ई-कोलाई (E. coli) जैसे जानलेवा बैक्टीरिया की मौजूदगी पाई गई है, जिसके बाद कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर ने पूरे शहर के स्वास्थ्य और जल विभाग को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने के निर्देश जारी किए हैं।
बैक्टीरिया की मौजूदगी और स्वास्थ्य जोखिम नगर निगम द्वारा की गई जांच में यह बात सामने आई है कि शहर के लगभग चार प्रमुख क्षेत्रों में भूजल (Ground Water) और कुछ वितरण लाइनों में मल-मूत्र के अवशेषों से पैदा होने वाले बैक्टीरिया मौजूद हैं। ई-कोलाई बैक्टीरिया मुख्य रूप से तब पनपता है जब सीवेज का गंदा पानी पीने के पानी की पाइपलाइन में मिल जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह बैक्टीरिया मानव आंतों पर सीधा हमला करता है, जिससे गंभीर दस्त, खूनी पेचिश, पेट में असहनीय ऐंठन और कुछ मामलों में किडनी फेलियर (HUS) जैसी स्थितियां बन सकती हैं। भोपाल के अस्पतालों को पहले ही निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे पानी से होने वाली बीमारियों (Waterborne Diseases) के मरीजों पर विशेष निगरानी रखें।
स्लॉटर हाउस विवाद और जल प्रदूषण का संबंध इस जल संकट के तार शहर के कचरा प्रबंधन और औद्योगिक कचरे से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। हाल ही में भोपाल के एक बड़े स्लॉटर हाउस (बूचड़खाने) में अनियमितताओं के चलते उसे सील किया गया है। जांच में पाया गया कि वहां से निकलने वाला अपशिष्ट और दूषित पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के जमीन में जा रहा था, जिससे आसपास के इलाकों का भूजल बुरी तरह संक्रमित हो गया है। प्रशासन इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या इस औद्योगिक लापरवाही का असर शहर की मुख्य जलापूर्ति लाइनों पर भी पड़ा है। इसी कारण से स्लॉटर हाउस के आसपास के लगभग 5 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी निजी बोरवेलों के पानी के उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी गई है।
पुरानी पाइपलाइन और सीवेज लीकेज की चुनौती भोपाल के पुराने इलाकों में जल संकट का सबसे बड़ा कारण दशकों पुरानी और जर्जर पाइपलाइनें हैं। शहर के कई हिस्सों में पेयजल की पाइपलाइनें और सीवेज की बड़ी लाइनें एक-दूसरे के बेहद करीब से गुजरती हैं। कई जगहों पर पाइपों में लीकेज होने के कारण गंदा पानी रिसकर सप्लाई के पानी में मिल रहा है। नगर निगम की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि 1,810 सैंपलों में से अधिकांश तो शुद्ध पाए गए, लेकिन जहां भी ई-कोलाई मिला है, वहां का बुनियादी ढांचा बेहद खराब स्थिति में है। निगम अब उन क्षेत्रों में युद्ध स्तर पर खुदाई कर पुरानी पाइपलाइनों को बदलने और लीकेज को प्लग करने का काम कर रहा है।
राजनीतिक गहमागहमी और जनता का विरोध इस गंभीर मुद्दे ने अब राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। विपक्ष ने भोपाल नगर निगम पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का तर्क है कि जनता से ‘जल कर’ (Water Tax) वसूलने के बावजूद उन्हें जानलेवा बैक्टीरिया वाला पानी पिलाया जा रहा है। नगर निगम मुख्यालय पर हुए प्रदर्शनों में मांग की गई है कि उन अधिकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए जिन्होंने जल परीक्षण और पाइपलाइनों के रखरखाव में ढिलाई बरती। वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि वे स्थिति को सुधारने के लिए पारदर्शी तरीके से काम कर रहे हैं और दोषी पाए जाने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।
सुरक्षा उपाय और भविष्य की कार्ययोजना वर्तमान स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने नागरिकों के लिए एक सख्त एडवायजरी जारी की है। लोगों से अपील की गई है कि वे निगम द्वारा सप्लाई किए जा रहे पानी को भी कम से कम 15 से 20 मिनट तक उबालकर और छानकर ही पिएं। साथ ही, क्लोरिनेशन की प्रक्रिया को तेज कर दिया गया है और शहर के सभी ओवरहेड टैंकों (पानी की टंकियों) की सफाई का विशेष अभियान शुरू किया गया है। भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए ‘स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट’ के तहत डिजिटल सेंसर लगाने की योजना बनाई जा रही है जो पानी में बैक्टीरिया का स्तर बढ़ते ही कंट्रोल रूम को अलर्ट भेज देंगे। फिलहाल, शहरवासी दहशत में हैं और बोतलबंद पानी की मांग में अचानक भारी उछाल देखा गया है।














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