विरासत का महापर्व और कलात्मक अभिसरण
भोपाल के प्रतिष्ठित रवींद्र भवन के प्रांगण में आयोजित ‘लोकरंग 2026’ अपने तीसरे दिन में प्रवेश कर चुका है, जो मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का सबसे उज्ज्वल प्रतीक बनकर उभरा है। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर से शुरू हुआ यह पांच दिवसीय आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की विविध जनजातीय कलाओं और लोक परंपराओं को संरक्षित करने का एक गंभीर प्रयास है। इस वर्ष के उत्सव में मध्य प्रदेश के सुदूर अंचलों से आए लोक कलाकारों के साथ-साथ अन्य राज्यों की संस्कृतियों का अनूठा समागम देखने को मिल रहा है, जो दर्शकों को एक ही स्थान पर पूरे भारत के दर्शन करा रहा है।
तीसरे दिन की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आकर्षण
उत्सव के तीसरे दिन के मुख्य आकर्षण में ‘देशांतर’ और ‘धरोहर’ जैसे खंड शामिल हैं, जहाँ आज शाम जनजातीय कलाकारों द्वारा बुंदेलखंड के राई, मालवा के मटकी और निमाड़ के गणगौर नृत्यों की भव्य प्रस्तुति दी जाएगी। मंच पर ताल, लय और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच कलाकार अपनी मिट्टी की खुशबू को जीवंत करेंगे। आज विशेष रूप से विदेशी कलाकार भी अपनी लोक विधाओं का प्रदर्शन करेंगे, जिससे यह वैश्विक मंच की गरिमा प्राप्त कर रहा है। इन प्रस्तुतियों का उद्देश्य विलुप्त हो रही लोक कलाओं को नई पीढ़ी के सामने गर्व के साथ प्रस्तुत करना और उन्हें प्रोत्साहित करना है।
शिल्प मेले और हस्तशिल्प प्रदर्शनी की धूम
नृत्य और संगीत के समानांतर, रवींद्र भवन परिसर में सजाया गया ‘शिल्प ग्राम’ पर्यटकों और कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहाँ मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध चंदेरी और माहेश्वरी साड़ियों के साथ-साथ झाबुआ की गुड़िया, डिंडोरी की गोंड पेंटिंग और टीकमगढ़ के पीतल शिल्प के स्टॉल लगाए गए हैं। हस्तशिल्प प्रदर्शनी में शिल्पकार अपनी कला का सजीव प्रदर्शन भी कर रहे हैं, जिससे आगंतुकों को इन वस्तुओं के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को समझने का अवसर मिल रहा है। यह बाजार न केवल व्यापार का माध्यम है, बल्कि कारीगरों की जीविका को सशक्त बनाने का एक मंच भी है।
व्यंजन मेला: चटोरे भोपालियों के लिए खास सौगात
लोकरंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘स्वाद’ संगम है, जहाँ मध्य प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों की महक आगंतुकों को अपनी ओर खींच रही है। इस व्यंजन मेले में मक्का की राबड़ी, दाल-बाफले, मक्के की रोटी और सरसों का साग जैसे शुद्ध पारंपरिक भोजन परोसे जा रहे हैं। आधुनिक फास्ट फूड के दौर में लोग इन पारंपरिक और पौष्टिक स्वादों का भरपूर आनंद ले रहे हैं। खान-पान के इन स्टॉल्स पर ग्रामीण परिवेश जैसा वातावरण तैयार किया गया है, जो शहरी दर्शकों को उनके पैतृक गांवों की याद दिलाता है और मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को बढ़ावा देता है।
वैश्विक कलाकारों का अंतर्राष्ट्रीय संवाद
इस वर्ष का लोकरंग इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि इसमें अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर विशेष जोर दिया गया है। आज होने वाले कार्यक्रमों में अफ्रीकी और पूर्वी यूरोपीय देशों के लोक दल अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य प्रस्तुत करेंगे। यह आदान-प्रदान न केवल मनोरंजन प्रदान करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे संगीत और लय भौगोलिक सीमाओं को पार कर मानवीय संवेदनाओं को एक सूत्र में पिरोते हैं। विदेशी मेहमानों के लिए भोपाल की गंगा-जमुनी तहजीब और यहाँ का आतिथ्य एक यादगार अनुभव साबित हो रहा है, जो मध्य प्रदेश के पर्यटन को विश्व स्तर पर मजबूती प्रदान करेगा।
समापन की ओर बढ़ता सांस्कृतिक सफर
जैसे-जैसे यह उत्सव 30 जनवरी के समापन की ओर बढ़ रहा है, इसमें शामिल होने वाले जनसैलाब का उत्साह दोगुना होता जा रहा है। 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर एक विशेष ‘शांति और अहिंसा’ आधारित प्रस्तुति के साथ इस महोत्सव का विधिवत समापन होगा। सरकार और संस्कृति विभाग का लक्ष्य है कि इस तरह के आयोजनों के माध्यम से जनजातीय गौरव और लोक संस्कृति को मुख्यधारा के युवाओं तक पहुंचाया जाए। लोकरंग 2026 अपनी भव्यता और विविधता के कारण आने वाले वर्षों के लिए एक नया मानक स्थापित कर रहा है, जहाँ हर शाम एक नई कहानी कहती है।














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