मध्यप्रदेश में श्वेत क्रांति का नया अध्याय: ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना’

डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना: मध्य प्रदेश में डेयरी क्रांति का नया अध्याय

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना’ का मुख्य उद्देश्य राज्य को देश की ‘मिल्क कैपिटल’ बनाना और पशुपालन को एक उच्च लाभकारी व्यवसाय के रूप में स्थापित करना है। 2026 तक इस योजना ने भोपाल सहित पूरे प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई गति प्रदान की है। इस महत्वाकांक्षी पहल के माध्यम से सरकार न केवल दूध उत्पादन बढ़ा रही है, बल्कि बेरोजगार युवाओं और पारंपरिक पशुपालकों को उद्यमी बनने का अवसर भी दे रही है। यह योजना वैज्ञानिक पद्धति से डेयरी फार्मिंग को बढ़ावा देने और आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर केंद्रित है, जिससे दुग्ध व्यवसाय की लाभप्रदता और स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

योजना की संरचना और वित्तीय सहायता का स्वरूप

इस योजना के तहत लाभार्थियों को 25 दुधारू पशुओं की एक इकाई (Unit) स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। एक मानक इकाई की कुल लागत लगभग 36 लाख से 42 लाख रुपये तक निर्धारित की गई है। वित्तीय बोझ को कम करने के लिए सरकार भारी सब्सिडी प्रदान कर रही है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लाभार्थियों को कुल परियोजना लागत पर 33% तक का अनुदान दिया जाता है, जबकि अन्य श्रेणियों के लिए यह अनुदान 25% (अधिकतम 10 लाख रुपये तक) है। शेष राशि बैंकों के माध्यम से ऋण के रूप में उपलब्ध कराई जाती है, जिससे कम पूंजी वाले उत्साही युवा भी बड़े स्तर पर डेयरी फार्म शुरू कर सकें।

विस्तार की क्षमता और पशुओं की नस्ल का चयन

योजना की एक प्रमुख विशेषता इसकी मापनीयता (Scalability) है। एक हितग्राही अपनी क्षमता और अनुभव के आधार पर अधिकतम 8 इकाइयां यानी कुल 200 पशुओं तक का फार्म बना सकता है। पशुओं के चयन में गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया है। योजना के अंतर्गत भारतीय मूल की उन्नत नस्लें जैसे गिर, साहीवाल, थारपारकर और रेड सिंधी के साथ-साथ उच्च दूध देने वाली संकर नस्लों और मुर्रा या भदावरी जैसी भैंसों को पालने की अनुमति है। एक इकाई में केवल एक ही नस्ल के पशु रखे जाते हैं ताकि प्रबंधन और दूध की गुणवत्ता में एकरूपता बनी रहे, जो आधुनिक डेयरी उद्योग की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

अनिवार्य पात्रता और भूमि की आवश्यकता

डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना का लाभ लेने के लिए कुछ कड़े लेकिन आवश्यक मापदंड निर्धारित किए गए हैं। आवेदक का मध्य प्रदेश का मूल निवासी होना अनिवार्य है और उसकी आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। पशुओं के बेहतर रखरखाव और चारे के प्रबंधन के लिए प्रत्येक इकाई (25 पशु) के पीछे लाभार्थी के पास न्यूनतम 3.5 एकड़ कृषि भूमि होना आवश्यक है। यदि कोई उद्यमी अधिकतम 8 इकाइयां स्थापित करना चाहता है, तो उसे आनुपातिक रूप से अधिक भूमि दिखानी होगी। यह शर्त सुनिश्चित करती है कि पशुओं के लिए पर्याप्त खुला स्थान और हरे चारे की उपलब्धता बनी रहे, जिससे दूध की उत्पादकता प्रभावित न हो।

प्रशिक्षण और आधुनिक प्रबंधन पर जोर

केवल वित्तीय सहायता देना ही इस योजना का लक्ष्य नहीं है, बल्कि पशुपालकों को कुशल बनाना भी प्राथमिकता है। योजना का लाभ लेने के लिए लाभार्थी को सरकारी या मान्यता प्राप्त संस्थानों से डेयरी फार्मिंग का प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, सरकार प्रशिक्षण और प्रारंभिक तैयारी के लिए अलग से अनुदान भी प्रदान करती है। फार्म के निर्माण में आधुनिक शेड, ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीनें और वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन को शामिल किया गया है। सरकार का मानना है कि जब पशुपालक आधुनिक तकनीकों से लैस होंगे, तभी वे वैश्विक मानकों के अनुरूप दुग्ध उत्पादन कर पाएंगे और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेंगे।

दूध संग्रहण नेटवर्क और बाजार एकीकरण

योजना को सफल बनाने के लिए इसे मौजूदा दुग्ध संघों और सहकारी समितियों के नेटवर्क से जोड़ा गया है। भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में उन पशुपालकों को प्राथमिकता दी जा रही है जो पहले से ही मिल्क रूट्स (Milk Routes) पर स्थित हैं या दुग्ध संघों को दूध की आपूर्ति कर रहे हैं। सरकार ने दूध के समर्थन मूल्य में वृद्धि की है और ‘बोनस’ जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं ताकि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिले। इस एकीकृत दृष्टिकोण से न केवल दूध के अपव्यय में कमी आई है, बल्कि बिचौलियों की भूमिका भी समाप्त हुई है, जिससे पशुपालकों की आय में प्रत्यक्ष रूप से 20% से 30% तक की वृद्धि देखी जा रही है।

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