आरक्षण की कानूनी जंग: पृष्ठभूमि और विवाद की शुरुआत
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद साल 2019 में शुरू हुआ था, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया था। इस फैसले के बाद राज्य में कुल आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर (63%) पहुंच गई, जिसे चुनौती देते हुए कई याचिकाएं हाई कोर्ट में दायर की गईं। मामला तब और पेचीदा हो गया जब कई सरकारी भर्तियों के परिणामों को ’87-13 फॉर्मूले’ के तहत जारी किया जाने लगा, जिसमें 13% पदों को कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रखते हुए होल्ड पर डाल दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या राज्य सरकार का यह कदम संवैधानिक रूप से मान्य है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता और पूर्ववर्ती सुनवाई का रुख
दिसंबर 2025 में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के सुस्त रवैये और बार-बार तारीखें मांगे जाने पर कड़ी नाराजगी जताई थी। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने स्पष्ट किया था कि इस मुद्दे को अब और अधिक नहीं लटकाया जा सकता क्योंकि यह हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी सवाल किया था कि जब 27% आरक्षण वाले मूल कानून पर कोई औपचारिक रोक नहीं है, तो राज्य सरकार इसे पूरी तरह लागू करने से क्यों कतरा रही है। आज की सुनवाई में कोर्ट उन दलीलों को विस्तार से सुनेगा जो इंदिरा साहनी मामले में तय की गई 50% की सीमा को चुनौती देती हैं।
87-13 फॉर्मूले का युवाओं पर प्रभाव और कानूनी पेच
राज्य सरकार ने भर्तियों में विवाद से बचने के लिए 87% पदों पर नियुक्ति देने और 13% पदों को ‘प्रोविजनल’ रखने का फॉर्मूला अपनाया था। इसके कारण एमपीपीएससी (MPPSC) और अन्य व्यापमं परीक्षाओं के हजारों चयनित अभ्यर्थी पिछले दो-तीन सालों से नियुक्ति के इंतजार में हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस फॉर्मूले ने युवाओं के करियर में अनिश्चितता पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट आज इस बात पर भी अपना रुख स्पष्ट कर सकता है कि क्या इन होल्ड किए गए 13% पदों को तत्काल जारी किया जाना चाहिए या आरक्षण की नई सीमा तय होने तक इन्हें इसी तरह लंबित रखा जाएगा।
राज्य सरकार का पक्ष: ‘असाधारण परिस्थितियों’ की दलील
मध्य प्रदेश की वर्तमान मोहन यादव सरकार ने कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखते हुए कहा है कि राज्य में ओबीसी वर्ग की आबादी लगभग 51% से अधिक है, जो इसे एक ‘असाधारण स्थिति’ (Extraordinary Situation) बनाती है। सरकार का तर्क है कि इतनी बड़ी आबादी को केवल 14% आरक्षण देना सामाजिक न्याय के विरुद्ध है। सरकार ने रामजी महाजन आयोग और अन्य पिछड़ा वर्ग आयोगों की रिपोर्टों का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश की है कि ओबीसी समुदाय अभी भी शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा है और उन्हें 27% आरक्षण देना संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही आता है।
इंतजार का अंत: क्या आज होगा अंतिम फैसला?
21 जनवरी 2026 की इस सुनवाई को ‘अंतिम सुनवाई’ के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट या तो आरक्षण की सीमा बढ़ाने को हरी झंडी दे देगा या फिर इसे 50% के भीतर ही सीमित रखने का आदेश सुनाएगा। यदि कोर्ट 27% आरक्षण के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण बनेगा। वहीं, यदि फैसला खिलाफ आता है, तो सरकार को आरक्षण नीति में बड़े बदलाव करने होंगे और पूर्व में हुई भर्तियों की मेरिट लिस्ट को दोबारा तैयार करना पड़ सकता है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ: आगे की राह
इस फैसले का प्रभाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका गहरा राजनीतिक असर भी होगा। मध्य प्रदेश के 48% से अधिक ओबीसी वोट बैंक को साधने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दल खुद को ओबीसी हितैषी साबित करने में जुटे हैं। कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि भविष्य की सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में दाखिले की प्रक्रिया क्या होगी। लाखों अभ्यर्थी सोशल मीडिया और सड़क पर प्रदर्शनों के जरिए कोर्ट से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। आज की सुनवाई भोपाल से लेकर दिल्ली तक चर्चा का केंद्र बनी हुई है, क्योंकि इसका परिणाम मध्य प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करेगा।














Leave a Reply