भोपाल, जिसे अपनी झीलों और हरियाली के लिए ‘सिटी ऑफ लेक्स’ कहा जाता है, वर्तमान में एक गंभीर जल संकट और स्वास्थ्य संबंधी चुनौती का सामना कर रहा है। हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने शहर के कई हिस्सों में दूषित पानी (Contaminated Water) की सप्लाई को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी ने भोपाल नगर निगम (BMC) और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए उन्हें कड़ी फटकार लगाई है।
एनजीटी की फटकार और 6 हफ्ते का अल्टीमेटम
मामले की गंभीरता को देखते हुए, एनजीटी की सेंट्रल बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने नाराजगी व्यक्त की है कि राजधानी जैसे शहर में, जहाँ जल स्रोतों की प्रचुरता है, वहां नागरिकों को पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है।
अदालत ने नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड को 6 सप्ताह के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। इस रिपोर्ट में उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि:
- पानी के दूषित होने के मुख्य स्रोत क्या हैं?
- सीवेज की लाइनें पीने के पानी की लाइनों में कहाँ मिल रही हैं?
- पिछले 6 महीनों में पानी की शुद्धता की कितनी जांच की गई और उनके परिणाम क्या रहे?
समस्या की जड़: सीवेज और पेयजल लाइनों का मिलन
भोपाल के पुराने शहर (Old Bhopal) और कुछ नए विकसित इलाकों जैसे कोलार और होशंगाबाद रोड की कॉलोनियों में यह समस्या सबसे अधिक है। कई स्थानों पर पेयजल की पाइपलाइनें दशकों पुरानी हैं, जो अब जर्जर होकर टूट चुकी हैं। वहीं, सीवेज नेटवर्क के सही ढंग से प्रबंधित न होने के कारण नालियों का गंदा पानी इन टूटी हुई पाइपलाइनों में रिसकर मिल जाता है।
स्थानीय निवासियों की शिकायत है कि नलों से आने वाला पानी अक्सर मटमैला होता है और उसमें से बदबू आती है। इस दूषित पानी के कारण शहर के विभिन्न अस्पतालों में डायरिया, टाइफाइड और पीलिया (Jaundice) के मरीजों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है।
प्रदूषण बोर्ड की भूमिका पर सवाल
एनजीटी ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी आड़े हाथों लिया है। ट्रिब्यूनल ने सवाल किया कि बोर्ड ने अब तक पानी के नमूनों की नियमित जांच क्यों नहीं की? जल प्रदूषण को रोकने के लिए बोर्ड ने नगर निगम पर भारी जुर्माना क्यों नहीं लगाया? कोर्ट ने साफ किया कि प्रदूषण बोर्ड केवल एक मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता, उसे अपनी नियामक शक्तियों का उपयोग करना होगा।
नगर निगम की दलील और चुनौतियां
दूसरी ओर, भोपाल नगर निगम का कहना है कि वे अमृत योजना (AMRUT Scheme) के तहत पाइपलाइनों को बदलने का काम कर रहे हैं। हालांकि, निगम ने यह स्वीकार किया है कि शहर के सघन इलाकों में सीवेज लाइन और पानी की लाइनें बहुत पास-पास हैं, जिससे लीकेज की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। निगम के अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि वे एनजीटी के निर्देशों का पालन करेंगे और उन क्षेत्रों में ‘वाटर प्यूरीफिकेशन’ की निगरानी बढ़ाएंगे जहाँ से सबसे अधिक शिकायतें आ रही हैं।
नागरिकों की सुरक्षा और पर्यावरण का मुद्दा
यह मामला केवल पाइपलाइनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़ा तालाब (Bhojtal) और अन्य जल निकायों के संरक्षण से भी जुड़ा है। यदि सीवेज का पानी सीधे तालाबों में गिरता है और वही पानी फिल्टर होकर घरों तक पहुँचता है, तो यह एक बड़े पारिस्थितिक संकट (Ecological Crisis) का संकेत है।
एनजीटी ने स्पष्ट कर दिया है कि “स्वच्छ पेयजल पाना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है” और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि 6 हफ्ते बाद पेश की गई रिपोर्ट असंतोषजनक पाई जाती है, तो नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों पर भारी जुर्माना या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
निष्कर्ष
एनजीटी की इस सख्ती ने प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या 6 सप्ताह के भीतर भोपाल नगर निगम जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव ला पाता है या यह मामला केवल कागजी रिपोर्टों तक ही सीमित रह जाता है। भोपाल के नागरिकों के लिए यह उम्मीद की किरण है कि अब उन्हें जल्द ही जहरीले पानी से मुक्ति मिल सकेगी।
















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