“BLF 2026: समापन सत्र में गूंजे सियासत और पर्यावरण के सवाल, दिग्गजों ने साझा किए विचार”

उत्सव का परिचय और ‘नॉलेज कुंभ’ की अवधारणा

भोपाल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल का यह 8वां संस्करण 9 से 11 जनवरी 2026 तक मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के ‘भारत भवन’ में आयोजित किया गया। इसे ‘नॉलेज कुंभ’ का नाम दिया गया है, क्योंकि यहाँ केवल पुस्तकों पर ही नहीं, बल्कि समाज को प्रभावित करने वाले गहरे विषयों पर मंथन होता है। इस वर्ष महोत्सव में 100 से अधिक वक्ताओं और विचारकों ने शिरकत की। कार्यक्रम के निदेशक और पूर्व आईएएस अधिकारी राघव चंद्रा के नेतृत्व में, इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भोपाल को एक वैश्विक बौद्धिक केंद्र के रूप में स्थापित करना और युवा पीढ़ी को विचार-विमर्श की संस्कृति से जोड़ना रहा।

समकालीन राजनीति और वैश्विक कूटनीति पर मंथन

उत्सव के समापन के दिन समकालीन राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गंभीर चर्चा हुई। ‘ग्लोबल ट्यूमुल्ट: हाउ इंडिया इज नेविगेटिंग इट’ जैसे सत्रों में पूर्व राजदूत सैयद अकबरुद्दीन, सुजान चिनॉय और मंजीव सिंह पुरी जैसे दिग्गजों ने अपने विचार रखे। चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि भारत किस प्रकार वैश्विक उथल-पुथल के बीच अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता बनाए हुए है। इसके अलावा, भारत-चीन संबंधों और पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियों पर भी विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिसमें सुरक्षा विशेषज्ञों ने सीमावर्ती क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

पर्यावरण और संरक्षण: एक संवेदनशील संवाद

महोत्सव का एक प्रमुख हिस्सा पर्यावरण और पारिस्थितिकी (Ecology) को समर्पित रहा। ‘लाइफ विद वाइल्डलाइफ’ और ‘इकोज ऑफ फेथ’ जैसे सत्रों में एम.के. रंजीतसिंह और अशोक लवासा जैसे विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इन चर्चाओं में इस बात पर जोर दिया गया कि कैसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए। वक्ताओं ने वन्यजीव संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के खतरों और प्रकृति के प्रति मानवीय संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। पर्यावरण के सत्रों ने युवाओं को यह संदेश दिया कि भविष्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए प्रकृति का संरक्षण अनिवार्य है।जनजातीय कला और ‘आदिरंग’ का संगम

BLF 2026 केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें कला का जीवंत प्रदर्शन भी देखने को मिला। ‘आदिरंग’ नामक जनजातीय कला शिविर में गोंड, बैगा और अन्य जनजातीय कलाकारों ने अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया। पद्मश्री दुर्गा बाई व्याम की कलाकृतियों की प्रदर्शनी आकर्षण का मुख्य केंद्र रही। इस मंच ने दूसरी और तीसरी पीढ़ी के आदिवासी कलाकारों को अपनी विरासत प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया। यह सत्र इस विचार पर आधारित था कि लोक कला और आधुनिक साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं और संस्कृति के संरक्षण में इनका योगदान अतुलनीय है।

चर्चित सत्र और वैचारिक विविधता

महोत्सव के दौरान कुछ सत्रों को लेकर वैचारिक मतभेद और चर्चाएं भी देखने को मिलीं। ‘बाबर: क्वेस्ट फॉर हिंदुइज्म’ और ‘डीकोडिंग विकसित भारत’ जैसे विषयों पर विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस हुई। इसके साथ ही रतन टाटा के जीवन पर आधारित सत्र में सिद्धार्थ शर्मा ने उनके विजन को साझा किया। साहित्य के मंच पर विलियम डेलरिंपल ने ‘द गोल्डन रोड’ के माध्यम से प्राचीन भारतीय व्यापार और संस्कृति के प्रसार पर चर्चा की। पीयूष मिश्रा जैसे कलाकारों के साथ हुए संवाद ने रचनात्मकता और व्यक्तिगत संघर्षों के पहलुओं को छुआ, जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।

समापन और भविष्य की रूपरेखा

महोत्सव का समापन पुरस्कार समारोह और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ। ‘यंग रंग’ प्रतियोगिता के माध्यम से छात्रों को कहानी सुनाने और पेंटिंग में पुरस्कृत किया गया, जो अगली पीढ़ी के लेखकों को प्रोत्साहित करने की एक पहल है। आयोजकों ने अंत में इस बात की पुष्टि की कि BLF का मंच लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त संवाद का प्रतीक बना रहेगा। तीन दिनों तक चले इस संगम ने यह सिद्ध कर दिया कि भोपाल केवल झीलों का शहर नहीं, बल्कि विचारों की एक गहरी विरासत को संजोए हुए है, जो हर साल और अधिक समृद्ध होती जा रही है।

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