भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल में ‘बाबर’ पर बवाल: हिंदू संगठनों के विरोध के बाद चर्चा रद्द, लेखक ने पीएम मोदी से मांगी मदद!

विवाद की शुरुआत और गलत सूचना का आरोप

विवाद तब शुरू हुआ जब भोपाल के एक स्थानीय समाचार पत्र ‘स्वदेश’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह पुस्तक मुगल शासक बाबर का महिमामंडन (Glorification) करती है। लेखक आभास मालदहियार का कहना है कि यह रिपोर्ट पूरी तरह भ्रामक और मानहानि करने वाली थी। उनके अनुसार, पुस्तक का शीर्षक ‘द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान’ बाबर द्वारा तैमूरी साम्राज्य की महत्वाकांक्षा को भारत में ‘दार-उल-इस्लाम’ के रूप में स्थापित करने के प्रयास को दर्शाता है, न कि उसकी प्रशंसा करता है।

हिंदू संगठनों का विरोध और धमकियां

समाचार पत्र की रिपोर्ट के बाद, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे कई संगठनों ने इस सत्र का कड़ा विरोध किया। संगठनों का तर्क था कि जिस बाबर ने राम जन्मभूमि को नष्ट किया, उस पर चर्चा करना हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। लेखक का दावा है कि उन्हें और आयोजकों को गंभीर धमकियां मिलीं, जिनमें पुस्तक की प्रतियां जलाने और बुकस्टोर्स में तोड़फोड़ करने की बातें कही गई थीं। सुरक्षा कारणों और संभावित हिंसा के डर से पुलिस ने आयोजकों को यह सत्र रद्द करने की सलाह दी।

‘भोपाल वसीयतनामा’ के मिथक पर चर्चा का उद्देश्य

लेखक ने स्पष्ट किया कि इस सत्र का मुख्य उद्देश्य ‘भोपाल वसीयतनामा’ (Bhopal Wasiyatnama) के पीछे की सच्चाई को उजागर करना था। मालदहियार के अनुसार, यह 19वीं शताब्दी का एक फर्जी दस्तावेज है, जिसे यह दिखाने के लिए गढ़ा गया था कि बाबर हिंदुओं के प्रति सहिष्णु था। लेखक का कहना है कि सत्र रद्द होने से एक ऐतिहासिक झूठ को उजागर करने का अवसर हाथ से निकल गया, क्योंकि उनकी पुस्तक बाबर को एक क्रूर आक्रांता के रूप में ही चित्रित करती है।

सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

लेखक ने मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी और साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे पर तीखा हमला बोला है। मालदहियार का आरोप है कि इन जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों ने पुस्तक का एक पन्ना भी पढ़े बिना सार्वजनिक रूप से इसकी निंदा की। उन्होंने प्रशासनिक दबाव को सत्र रद्द होने का मुख्य कारण बताया और इसे बौद्धिक स्वतंत्रता का हनन करार दिया। आयोजकों ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने भारी मन से और पुलिस के दबाव में यह निर्णय लिया।

पीएम मोदी को खुला पत्र और हस्तक्षेप की मांग

मामला बढ़ने पर लेखक आभास मालदहियार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने घटना की पूरी जानकारी देते हुए बताया कि कैसे एक ‘दक्षिणपंथी’ लेखक होने के बावजूद उन्हें उन्हीं संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा जिन्हें वह वैचारिक रूप से सशक्त कर रहे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की है कि इस मामले में हस्तक्षेप किया जाए ताकि भविष्य में शोध-आधारित इतिहास लेखन को इस तरह के निराधार विरोध और प्रशासनिक सेंसरशिप का शिकार न होना पड़े।

वैचारिक संघर्ष और वर्तमान स्थिति

यह विवाद अब एक वैचारिक युद्ध में बदल गया है। एक ओर जहाँ संगठन इसे सांस्कृतिक सुरक्षा का मामला बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जे. साई दीपक जैसे कई बुद्धिजीवियों ने लेखक का समर्थन किया है। उनका कहना है कि जो लोग बाबर का विरोध कर रहे हैं, वे उन विद्वानों को ही निशाना बना रहे हैं जो बाबर के काले इतिहास को तथ्यों के साथ सामने ला रहे हैं। वर्तमान में यह सत्र पूरी तरह रद्द है, लेकिन इस विवाद ने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘ऐतिहासिक शोध’ के बीच की लकीर पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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