अस्पताल की साख पर गहरा आघात भोपाल का जय प्रकाश (जेपी) अस्पताल शहर के सबसे प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक है, जहाँ हर दिन हजारों की संख्या में मध्यम और निम्न वर्ग के लोग इलाज के लिए आते हैं। हाल ही में सीलबंद माउथवॉश की बोतल में मरा हुआ कीड़ा मिलने की घटना ने अस्पताल की साख को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि उन हजारों मरीजों के भरोसे के साथ खिलवाड़ है जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अस्पताल के भीतर दवाओं के भंडारण और वितरण प्रणाली में कितनी बड़ी खामियां मौजूद हैं।
मरीज की सतर्कता और घटना का विवरण यह मामला तब सामने आया जब अस्पताल में भर्ती एक मरीज को दंत विभाग या संबंधित वार्ड से माउथवॉश की एक बोतल दी गई। मरीज ने जब उपयोग करने के लिए बोतल को गौर से देखा, तो उसके भीतर एक स्पष्ट रूप से मरा हुआ कीड़ा तैरता हुआ नजर आया। चौंकाने वाली बात यह थी कि बोतल पूरी तरह से सीलबंद (Sealed) थी, जिसका अर्थ है कि यह अशुद्धि निर्माण प्रक्रिया (Manufacturing) या पैकिंग के दौरान ही भीतर चली गई थी। मरीज की सतर्कता की वजह से एक बड़ा हादसा टल गया, अन्यथा संक्रमित दवा के उपयोग से उसे गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती थीं।
दवाइयों की गुणवत्ता और पिछली घटनाएं जेपी अस्पताल में यह पहली बार नहीं है जब दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठे हों। कुछ ही समय पहले इसी अस्पताल में फफूंद (Fungus) लगी हुई टैबलेट मिलने का मामला भी सुर्खियों में रहा था। बार-बार इस तरह की घटनाओं का होना यह दर्शाता है कि अस्पताल में दवाओं की ‘क्वालिटी चेकिंग’ की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। जब कोई दवा बैच अस्पताल पहुंचता है, तो उसका औचक निरीक्षण करना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी होती है, लेकिन लगातार हो रही इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया गया है।
अस्पताल प्रबंधन और सप्लाई चेन की विफलता इस घटना ने सीधे तौर पर ‘मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सप्लाई कॉरपोरेशन’ और अस्पताल के स्टोर विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकारी अस्पतालों में दवाएं एक लंबी प्रक्रिया के तहत खरीदी और सप्लाई की जाती हैं। यदि सीलबंद बोतलों में कीड़े या गंदगी मिल रही है, तो इसका मतलब है कि जिन कंपनियों को दवा बनाने का ठेका दिया गया है, वे स्वच्छता मानकों का पालन नहीं कर रही हैं। साथ ही, अस्पताल प्रबंधन भी बिना किसी कड़े लैब टेस्ट या फिजिकल वेरिफिकेशन के इन दवाओं को मरीजों तक पहुंचा रहा है।
जनता का आक्रोश और स्वास्थ्य जोखिम इस खबर के फैलते ही भोपाल के नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि गरीब मरीज पहले से ही बीमारी से जूझ रहा होता है और ऐसे में अस्पताल द्वारा दी गई “जहरीली” दवाएं उसकी जान ले सकती हैं। माउथवॉश का उपयोग अक्सर सर्जरी के बाद या मुंह के संक्रमण को रोकने के लिए किया जाता है; ऐसे में यदि कीड़े वाली दवा शरीर के संपर्क में आती, तो इससे सेप्सिस (Sepsis) या अन्य खतरनाक संक्रमण होने का खतरा था। सोशल मीडिया पर भी लोग सरकार से स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
भविष्य की चुनौतियां और आवश्यक कार्रवाई इस मामले के उजागर होने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन केवल जांच ही काफी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि उस विशेष बैच की सभी दवाओं को तुरंत वापस (Recall) लिया जाना चाहिए और संबंधित कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए। इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में ‘ड्रग इंस्पेक्टरों’ की तैनाती और वितरण से पहले दवाओं के रैंडम सैंपल टेस्ट को अनिवार्य बनाना होगा। यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो इस तरह की लापरवाही भविष्य में किसी बड़ी जनहानि का कारण बन सकती है।















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